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Dr. Iqbal Sayyed (Homeopathy) needs a second opinion on this medical case.
नीम - मेलियासिए परिवार का नीम (अजादिरक्ता इंडिका) भारत में पाई जाने वाली सर्वाधिक उपयोगी और मूल्यवान वृक्ष-प्रजातियों में से एक है। यह पीएच 10 तक की अनेक प्रकार की मिटि्टयों में उग सकता है, जो कि इसे भारतीय उप महाद्वीप में एक सर्वाधिक बहुआयामी और महत्वपूर्ण वृक्ष बनाता है। इसके अनेक प्रकार के उपयोगों की वजह से, भारतीय कृषकों द्वारा इसकी खेती वैदिक काल से की गई है और अब यह भारतीय संस्कृति का अंग बन गया है। भारत में, यह पूरे देश में पाया जाता है और, ऊंचे एवं ठंडे क्षेत्रों तथा बांध-स्थलों को छोड़कर, हर प्रकार के कृषि-जलवायु अंचलों में अच्छी तरह उग सकता है। सच बात तो यह है कि भारत में नीम के वृक्ष, फसलों को कोई नुकसान पहुंचाए बिना, अक्सर कृषकों के खेतों में और खेतों की मेड़ों पर छितरे हुए रूप में उगे हुए पाये जाते हैं। कृषक इस प्रणाली को केवल निर्माण-काष्ठ, चारे, ईंधन के रूप में काम में आने वाली लकड़ी की स्थानीय मांग को पूरा करने के लिए और विभिन्न औषधीय गुणों के लिए अपनाते हैं। इसकी मुसलमूल प्रणाली की वजह से, यह मिट्टी में उपलब्ध अल्प नमी के लिए वार्षिक फसलों से प्रतिस्पर्द्धा नहीं करता। नीम के वृक्ष को इसके अनेक प्रकार के उपयोगों के कारण सही अर्थों में आश्चर्य वृक्ष कहा जा सकता है। यह एक लंबे समय से एक औषधीय वृक्ष के रूप में उपयोग किया जाता रहा है और ग्रामीण क्षेत्रों की लगभग सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है - चाहे वह निर्माण-काष्ठ हो, ईंधन के रूप में काम में आने वाली लकड़ी हो, चारा हो, तेल हो, उर्वरक हों, कीट-रोधी हों या फिर सर्वव्यापी `दातुन` हो।  आज इसे भारत का सर्वाधिक संभाव्यतायुक्त वृक्ष मान लिया गया है क्योंकि यह सदाबहार प्रकृति (शुष्क क्षेत्रों में पर्णपाती) का है, सर्वाधिक शुष्क और कम पोषक तत्वों वाली मिट्टियों में भी उग सकता है, इसके कई उप-उत्पादों का वाणिज्यिक रूप से उपयोग किया जा सकता है और इसमें पर्यावरण की दृष्टि से लाभदायक गुण हैं (इसलिए इसे भविष्य का वृक्ष भी कहा गया है)। यदि इस वृक्ष के बड़े पैमाने पर बागान लगाने का कार्य हाथ में लिया जाना है, तो इसे विभिन्न्न कृषि-वानिकी प्रणालियों के अंतर्गत कृषि के एक महत्वपूर्ण घटक के रूप में समन्वित किया जाना होगा। ऐसा अनुमान है कि भारत के नीम प्रतिवर्ष लगभग 35 लाख टन मींगी उत्पन्न्न करते हैं। इससे लगभग 7 लाख टन तेल निकाला जा सकता है। 1980 के दशक के उत्तरार्द्ध में वार्षिक उत्पादन लगभग 1.5 लाख टन मात्र था। प्राप्त होने वाले तेल की मात्रा को बढ़ाने के लिए, खादी और ग्रामोद्योग आयोग (केवीआईसी) ने पिछले दो दशकों के दौरान नीम के फल और बीजों के प्रसंस्करण के विभिन्न्न पहलुओं का मार्ग प्रशस्त किया है। नीम सहित वृक्षों पर लगने वाले अधिकांश तिलहनों के मामले में देखने में आई मुख्य कठिनाई यह है कि नीम के फलों को नम मौसम में तोड़ा जाना होता है। सुखाने की सुविधा स्थानीय रूप से उपलब्ध न होने की स्थिति में, फल और बीज तेजी से खराब होने लगते हैं और एफ्लोटोक्सिन से ग्रस्त हो जाते हैं। आदर्श रूप में, फलों का गूदा अविलंब निकाल लिया जाना चाहिए और बीजों को पूरी तरह से सुखा लिया जाना चाहिए। केवीआईसी ने देश के दूर-दराज के भागों में भी नीम के उत्पादों का गूदा निकालने, सुखाने और छिलका उतारने की सरल विधियों को लोकप्रिय बना दिया है। भारत में नीम के बीजों के बारे में कई एजेंसियों ने अनुमान लगाया है। प्रमुख नीम बीज बाजारों में स्वतंत्र एजेंसियों द्वारा किए गए यादृच्छिक सर्वेक्षण के अनुसार, 1996 के दौरान बेचे गए नीम के बीजों की मात्रा 5.5 लाख टन थी और कुल 137 करोड़ रुपए था।
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